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10th Sanskrit Chapter 5 भारतमहिमा पाठ का हिन्दी अनुवाद

दोस्तों इस पोस्ट में मैंने आपको 10th Sanskrit Chapter 5 भारतमहिमा पाठ का हिन्दी अनुवाद के साथ पाठ के सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया हूँ उम्मीद करता हूँ की आपको काफी पसंद आएगी । अगर आपलोग किसी बोर्ड परीक्षा की तैयारी करना चाहते हैं तो आप हमारे Youtube Channel Unlock Study पर जाकर कर सकते हैं।

पञ्चमः पाठः- भारतमहिमा

(भारत की महिमा)

(अस्माकं देशः भारतवर्षमिति कथ्यते। अस्य महिमा सर्वत्र गीयते। पाठेऽस्मिन् विष्णुपुराणात् भागवतपुराणात् च प्रथमं द्वितीयं च क्रमशः पद्यं गृहीतमस्ति। अवशिष्टानि पद्यान्यध्यक्षेण निर्मीय प्रस्तावितानि।. भारतं प्रति भक्तिरस्माकं कर्तव्यरूपेण वर्तते।)

अर्थ- हमलोगों का देश भारत वर्ष है ऐसा कहा जाता है। इसका महिमा सब जगह गाये जाते हैं। इस पाठ में विष्णु पुराण और भागवत पुराण से क्रमशः पहला और दूसरा पद्य लिया गया है। नीचे निर्मित प्रमुख पद मुख्य रूप से प्रस्तावित है। हमसब लोगों का भारत के प्रतिभक्ति कर्तव्य है।

पौराणिकी

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥

अर्थ- देवता भी गीत गाते हैं- निश्चय ही वे पुरुष धन्य हैं जो स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने योग्य भारत भूमि में देवत्व के रूप में विद्यमान हैं।

पौराणिकी

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदमार्ग भूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥

अर्थ- हे! ऐसा क्या किया गया कि इस शोभनीय भारत भूमि में जन्म प्राप्त किया। जो श्रीहरि की सेवा करने योग्य होते हैं उनकी प्रसन्नता और इच्छा प्राप्त करते हैं। वही यहाँ जन्म प्राप्त करते हैं।

आधुनिकी

इयं निर्मला वत्सला मातृभूमिः

प्रसिद्धं सदा भारतं वर्षमेतत्।

विभिन्ना जना धर्मजातिप्रभेदै-

रिहैकत्वभावं वहन्तो वसन्ति ॥

अर्थ- यह प्रसिद्ध भारतवर्ष सदा निर्मल, ममतामयी मातृभूमि यहाँ धर्म जाति के भेद से हीन लोग एकता के भाव को धारण करते हुए रहते हैं।

विशालास्मदीया धरा भारतीया

सदा सेविता सागरै रम्यरूपा।

वनैः पर्वतैर्निर्झरैर्भव्यभूति-

र्वहन्तीभिरेषा शुभा चापगाभिः ।।

अर्थ- हमलोगों का भारतभूमि विशाल, रमणीय, शुभ भव्य ऐश्वर्य वाली है। यह सागरो में पर्वतों से झरनों से, नदियों से धारण करने से सदा सेवित है। (सेवा करने योग्य है)

जगद्‌गौरवं भारतं शोभनीयं सदास्माभिरेतत्तथा पूजनीयम्।

भवेद् देशभक्तिः समेषां जनानां परादर्शरूपा सदावर्जनीया ।।

अर्थ- यह भारत हमलोगों के द्वारा सदा पूजा करने योग्य संसार का गौरव तथा शोभनीय है। सभी जनों को हमेशा आकर्षण योग्य आदर्शरूप देशभक्त होना चाहिए।

अन्वयाः

1. देवाः गीतकानि गायन्ति ते पुरुषाः धन्याः किल (सन्ति ये) स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भारतभूमिभागे सुरत्वात् भूयः भवन्ति ।

अर्थ- देवता भी गीत गाते हैं- निश्चय ही वे पुरुष धन्य हैं जो स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने योग्य भारतभूमि में देवत्व के रूप में विद्यमान हैं।

2. (देवाः गोयन्तः कथयन्ति) अहो! अमीषाम् (एभिः किं शोभनम् अकारि ? (यत्) नृषु यैः भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिकं जन्म लब्धम्। स्विदुत एषां स्वयं हरिः प्रसन्नः । हि नः (अपि) स्पृहा।

अर्थ- (देवता गाते हैं कहते हैं) हे! ऐसा क्या किया गया कि इस शोभनीय भारत भूमि में जन्म प्राप्त हुआ। जो श्री हरि की सेवा करने योग्य होते हैं वही उनकी इच्छा और प्रसन्नता से प्राप्त करते हैं।

3. एतत् प्रसिद्धं भारतं वर्षम्, इयं सदा निर्मला वत्सला मातृभूमिः इह धर्मजातिप्रभेदैः विभिन्नाः जनाः एकत्वभावं वहन्तः वसन्ति।

अर्थ- यह प्रसिद्ध भारतवर्ष सदा निर्मल, ममतामयी मातृभूमि यहाँ धर्म जाति के भेद से हीन लोग एकता के भाव को धारण करते हुए रहते हैं।

4. अस्मदीया भारतीया धरा विशाला, स्यरूपा, शुभा भव्यभूतिः (च) एषा सागरैः, पर्वतैः,

निर्झरैः वहन्तीभिः आपगाभिः च सदा सेविता (अस्ति)।

अर्थ- हमलोगों का शुभ भारतभूमि, विशाल, रमणीय, भव्यऐश्वर्य वाली है। यह सागरों से नदियों से झरनों से धारण करने से सदा सेवित है।

5. तथा शोभनीयं जगद्‌गौरवम् (च) एतत् भारतम् अस्माभिः सदा पूजनीयम्। (अत्रत्यानाम्) समेषां जनानां सदा आवर्जनीया परादर्शरूपा देशभक्तिः भवेत्।

अर्थ- यह भारत हमलोगों के द्वारा सदा पूजा करने योग्य संसार का गौरव तथा शोभनीय है। सभी जनों को हमेशा आकर्षण योग्य आदर्शरूप देशभक्त होना चाहिए।

पदच्छेदाः

धन्यास्तु — धन्याः + तु

किमकारि — किम् + अकारि

स्विदुत — स्वित् + उत

यैर्जन्म — यैः + जन्म

भारताजिरे — भारत + अजिरे

मुकुन्दसेवौपयिकम् — मुकुन्दसेवा + औपयिकम्

धर्म-जाति-प्रभेदैरिहैकत्वभावम् — धर्म-जाति-प्रभैदैः इह + एकत्वभावम्

विशालास्मदीया —  विशांला + अस्मंदीया

पर्वतैर्निर्झरैर्भव्यभूतिर्वहन्तीभिरेपा — पर्वतैः + निर्झरैः भव्यभूतिः वहन्तीभिः + एषा

चापगाभिः — च + आपगाभिः

जगद्‌गौरवम् — जगत् + गौरवम्

सदास्माभिरेतत्तथा — सदा + अस्माभिः + एतत् + तथा

परादर्शरूपा — परा + आदर्शरूपा

सदावर्जनीया — सदा + आवर्जनीया

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते — स्वर्ग + अपवर्ग + आस्पदमार्गभूते

पदार्थाः

अकारि — अक्रियत — किया गया (कृ + लुङ् लकार, प्र० पु० एकवचन कर्मवाच्य)

किल — नूनम् — निश्चयवाचक अव्यय

सुरत्वात् — देवत्वात् — देवत्व के रूप में

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते — स्वर्ग-मोक्ष-योग्यमार्गरूपे — स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने योग्य- साधनस्वरूप।

भारताजिरे — भारतप्रांगणे — भारतभूमि में

स्विदुत —  आहोस्वित् —  अथवा

मुकुन्दसेवौपयिकम् — विष्णुसेवायोग्यम् — श्रीहरि की सेवा के योग्य

स्पृहा — वाञ्छा — इच्छा

वत्सला —  वात्सल्ययुक्ता  —  ममतामयी

धर्म-जाति-प्रभैदैः — धर्मगत-जातिगत भेदोपभेदैः — धर्म और जाति के भेदों से

एकत्वभावम् — एकात्मभावम् — एकता के भाव को

वहन्तः — धारयन्तः  — धारण करते हुए

अस्मदीया — अस्माकम् — हमारी

भव्यभूतिः — दिव्यैश्वर्या —भव्य ऐश्वर्य वाली

आपगाभिः —नदीभिः — नदियों के द्वारा

समेषाम् — सर्वेषाम् —  सभी की

परा — श्रेष्ठा — श्रेष्ठ

आवर्जनीया — आकर्षणीया — आकर्षण योग्य

आदर्शरूपा — उदाहरणरूपा — आदर्शरूप

गीतकानि — गीतानि — गीत

व्याकरणम्

गीतकानि — गीतम् एव गीतकम् तानि गीतकानि स्वार्थे कञ् प्रत्ययः।

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते — स्वर्गस्य अपवर्गस्य च मार्गभूतः (साधनस्वरूपः) सप्तमी एकवचने

अकारि — कृ धातोः कर्मवाच्ये प्रथमपुरुषे एकवचने लुङ्ङ्क्षकारे त प्रत्यये कृते ‘अकारि’ इति सिद्धम्।

भारताजिरे — भारतस्य अजिरे – पष्ठी तत्पुरुषः

मुकुन्दसेवौपयिकम् — मुकुन्दस्य सेवा इति मुकुन्दसेवा, तस्याः औपयिकम् उपायभूतम् इति मुकुन्दसेवौपयिकम् षष्ठी तत्पुरुषः

वहन्तः — वह शतृ प्रत्यये वहत् पुल्लिङ्गे प्रथमा बहुवचने वहन्तः।

सेविता — सेव् क्त टाप्

भव्यभूतिः — भव्या भूतिः यस्याः सा भव्यभूतिः

अस्मदीया — अस्मद् छ (ईय) + टाप्

वहन्तीभिः —  वह + शत् इति वहत् + ङीप् वहन्ती तृतीय बहुवचनम्

शोभनीयम् —  शुभ् + अनीयर्

पूजनीयम् —  पूज् + अनीयर्

आवर्जनीया —  आङ् + वृज् + अनीयर् + टाप्

देशभक्तिः — देशाय भक्तिः चतुर्थी तत्पुरुषः ।

अभ्यासः (मौखिकः)

1. एकपदेन उत्तरं वदत-

(क) के गीतकानि गायन्ति ?

उत्तर- देवाः

(ख) एषां कः प्रसन्नः ?

उत्तर-हरिः

(ग) इयं निर्मला मातृभूमिः कीदृशी अस्ति ?

उत्तर- वत्सला

(घ) अस्मदीया भारतीया घरा कीदृशी अस्ति ?

उत्तर- विशाला

(ङ) अस्माभिः सदा किं पूजनीयम् ?

उत्तर- भारतम्

2. स्वमातृभूमि विषये द्वे वाक्ये वदत।

उत्तर- मम मातृभूमिः वत्सला अस्ति। अस्माकं मातृभूमिः सदा पूजनीया अस्ति।

अभ्यासः (लिखितः)

1. एकपदेन उत्तरं लिखतः

(क) देवाः कानि गायन्ति ?

उत्तर- गीतकानि

(ख) जनैः कीदृशं जन्म लब्धम् ?

उत्तर- मुकुन्दसेवौपयिकम्

(ग) विशाला धरा का ?

उत्तर- भारतीया

(घ) जगद् गौरवं किं वर्तते ?

उत्तर- भारतम्

(ङ) समेषां जननां का भवेत् ?

उत्तर- आदर्शरूपा

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत

(क) अस्माकं भारतीया धरा कीदृशी अस्ति ?

उत्तर- अस्माकं भारतीया धराविशाला अस्ति।

(ख) भारतीया धरा कैः कामिः च सेविता ?-

उत्तर- भारतीया धरा सागरैः आपगामिः च सेविता।

(ग) धर्मजाति प्रभेदैः विभिन्नाः जनाः किं वहन्तः वसन्ति ?

उत्तर-धर्मजाति प्रभेदैः विभिन्नाः जनाः एकत्वभावं वहन्तः वसन्ति ।

(घ) के वारंलारं भारते जन्म गृह्णन्ति ?

उत्तर-यैः मुकुन्दसेवौपयिकम् वारंवारं भारते जन्म गृह्णन्ति ।

(ङ) सर्वेषां जननां देशभक्तिः कीदृशी भवेत् ?

उत्तर-सर्वेषां जनानां देशभक्तिः आदर्शरूपा भवेत्।

(च) भारतभूमिः कीदृशी अस्ति ?

उत्तर-भारतभूमिः स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते अस्ति।

(छ) भारताजिरे जन्म लब्धुं स्पृहा केषाम् अस्ति ?

उत्तर-भारताजिरे जन्म लब्धुं स्पृहा मुकुन्दसेवौपयिकं अस्ति।

प्रश्न 3. मञ्जूषायां लिखितपदानां समुचितप्रयोगं कृत्वा

उदाहरणम् अनुसृत्य पञ्च वाक्यानि रचयत-

रामेण, श्यामेन, लतया, सीतया, हिमांशुना, शिशुना, गीता ग्रन्थः, कार्यम्, पत्रम्, रामायणम्, चित्रम्, लेखनीयम्, दर्शनीयम् पठनीयम्, स्मरणीया, पठनीयः, करणीयम्।

उदाहरणम्ः- रामेण पत्रं लेखनीयम्।

उत्तर-(क) सीतया कार्यम् करणीयम्।

(ख) श्यामेन रामायणम् पठनीयः।

(ग) गीता चित्रम् दर्शनीयम्।

(घ) लतया पत्रम् पठनीयम्।

(ङ) हिमांशुना रामायणम् दर्शनीयम्।

4. उदाहरणम् अनुसृत्य निम्नांकितपदानां कृते विलोमपदानि लिखत-

उदाहरणम्ः – “धन्याः” इतिपदस्य विलोमपदम् = अधन्याः

प्रश्न                                                उत्तर

प्रश्नाः (क) सुरः                        असुरः

(ख) पूजनीयम्                        अपूजनीयम्

(ग) भारतीया                          अभारतीया

(घ) शोभनम्                          अशोभनम्

(ङ) प्रसन्नः                             अप्रसन्नः

(च) प्रसिद्धम्                          अप्रसिद्धम् :

(छ) शुभा                               अशुभा

(ज) लब्धम्                             अलब्धम्

(झ) गौरवम्                           अगौरवम्

(ञ) रम्यरूपा                        अरम्यरूपा

5. उदाहरणम् अनुसृत्य रेखांकितानां स्थाने विलोमपदानां प्रयोगं कृत्वा वाक्यानि रचयत ।

उदाहरणम् ये पुण्यं कुर्वन्सि ते धन्याः भवन्ति।

उत्तरम्-ये पापं कुर्वनित ते अद्यन्याः भवन्ति।

(क) ये सर्जनाः सन्ति ते शोभनं कार्य कुर्वन्ति ।

उत्तर- ये दुर्जनाः सन्ति ते अशोभनं कार्यं कुर्वन्ति।

(ख) पुरा गङ्गा निर्मला प्रवहति स्म।

उत्तर-अधुना गंगा अनिर्मला प्रवहति स्म।

(ग) नाटिका सपुष्पवृक्षैः रम्या प्रतिभाति।

उत्तर-वाटिका अपुष्पवृक्षैः अरम्या प्रतिभाति।

(घ) धर्मात्मा अस्माभिः पूजनीयः ।

उत्तर-दुरात्मा अस्माभिः अपूजनीयः ।

(ङ) सद्व्यवहारेण मनसि शान्तिः प्रवर्धते ।

उत्तर-दुद्व्यवहारेण मनसि अशान्तिः प्रवर्धते।

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