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Class 10 Sanskrit Chapter 1 Manglam Question Answer

दोस्तों इस पाठ में आपको Class 10 Sanskrit Chapter 1 Manglam (मंगलम् ) पाठ के सभी प्रश्नों  मौखिक, लिखित, 1 अंक स्तरीय, 2 अंक स्तरीय तक की बिहार बोर्केड मैट्रिक परीक्षा में संस्कृत विषय में 8 प्रश्न प्रत्येक प्रश्न 2 अंको का यानि कुल 16 अंकों का प्रश्न हिन्दी में लिखने के लिए पूछा जाता है उन प्रश्नों का उत्तर भी बिल्कुल आसान भाषा में दिया गया है जो आपको इस पोस्ट के नीचे मिल जायेगा, जिसे पढ़ कर आप अपनी पढाई को और बेहतर कर सकते हो और बोर्ड परीक्षा में अच्छे नंबर ला सकते हो |


अभ्यासः (मौखिकः)

1. एकपदेन उत्तरं वदत –

(क) हिरण्मयेन पात्रेण कस्य मुखम् अपिहितम् ?

उत्तरम्:- सत्यस्य

(ख) सत्यधर्माव प्राप्तये किम् अपावृणु ?

उत्तरम्:- पात्रम्

(ग) ब्रह्मणः मुखं केन आच्छादितमस्ति ?

उत्तरम्:- हिरण्मयेन

(घ) महतो महीयान् कः ?

उत्तरम्:- आत्मनः

(ङ) अणोः अणीयान् कः ?

उत्तरम्:- आत्मनः

(च) पृथिव्यादेः महत्परिमाणयुक्तात् पदार्थात् महत्तरः कः ?

उत्तरम्:- सत्यः

(छ) कीदृशः पुरुषः निजेन्द्रियप्रसादात् आत्मनः महिमानं पश्यति शोकरहितरच भवति ?

उत्तरम्:- अक्रतुः

(ज) किं जयं प्राप्नोति ?

उत्तरम्:- सत्यम्

(झ) किं जयं न प्राप्नोति ?

उत्तरम्:- अनृतम्

(ञ) काः नाम रूपञ्च विहाय समुद्रे अस्तं गच्छन्ति ?

उत्तरम्:- नदी

2 . एतेषाम् यट्यानाम् प्रथम चरणं मौखिकरूपेण पूरयत –

(क) हिरण्मयेन पात्रेण।

(ख) अणोरणीयान् महत्तो महीयान्।

(ग) सत्यमेव जयते मानृतं।

(घ) यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे।

(ङ) वेदाहमेतं पुरूषं महान्तम्।

3. एतेषां पदानाम् अर्थ तदत –
अपिहितम्             –       ढका हुआ
सत्यधर्माय             –       सत्यधर्मवान् के लिए
अणोरणीयान्         –       सूक्ष्म से सूक्ष्मतर
अक्रतुः                  –       बुद्धि रहित
वीतशोकः              –       शोकरहित
विततः                    –       विस्तार होता है।
देवयानः                 –       देवसवारी
आप्तकामाः           –        परमात्मा से प्रेम करने वाले
स्यन्दमानाः            –        प्रवाहित होती हुए
अयनाय                –        ऋतु के लिए
4. स्वस्मृत्या काञ्चित् संस्कृतप्रार्थनां श्रावयत।

उत्तर:-  विद्याधी स्वयं करें।


अभ्यासः (लिखितः)

1. एकपदेन उत्तरं लिखत –

(क) सत्यस्य मुखं केन पात्रेण अपिहितम् अस्ति ?

उत्तरम्:- स्वर्णमयेन

(ख) पूषा करमै सत्यस्य मुखम् अपावृणुयात् ?

उत्तरम् :- सत्यधर्माव

(ग) कः महतो महीयान् अस्ति ?

उत्तरम् :- आत्मनः

(घ) किं जयते ?

उत्तरम् :- सत्यम्

(ङ) देवयानः पन्थाः केन विततः अस्ति ?

उत्तरम् :- सत्येन

(च) नत्यः के विहाय समुद्रे अस्तं गच्छन्ति ?

उत्तरम् :- नामरूपे

(छ) साधकः पुरुर्ष विदित्वा कम् अत्येति ?

उत्तरम् :- मृत्युम्

2. अधोलिखितम् उदाहरणम् अनुसृत्य प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत

यथा- प्रश्न : सत्यस्य मुखं केन अपिहितम् अस्ति ?

उत्तरम् :- सत्यस्य मुर्ख हिरण्मयेन पात्रेण अपिहितम् अस्ति।

(क) कस्य गुहायाम् अणोः अभीयान् आत्मा निहितः अस्ति ?

उत्तरम् :- जन्तोः गुहायाम अजोः अणीयान् आत्मा निहितः अस्ति।

(ख) विद्वान् कस्मात् विमुक्तो भूत्वा परात्परं पुरुषम् उपैति ?

उत्तरम् :- विद्वान् नामरूपात् विमुक्तो भूत्वा परात्परं पुरूषम् उपैति।

(ঘ) आप्तकामा ऋषयः केन पया सत्यं प्राप्नुवन्ति ?

उत्तरम् :- आप्तकामा ऋषयः सत्येन पथा सत्यं प्राप्नुवन्ति।

(५) विद्वान् कीदृशं पुरुषं चेति ?

उत्तरम् :- वेदाहमेतं-पुरूषं महान्तम् ।

3. सन्धि-विच्छेदं कुरुत

(क) कस्यापिहितम्        =    कस्य + अपहितम्

(ख) अणोरणीयान्        =     अणोः + अणीयान्

(ग) जन्तोर्निहितः          =     जन्तोः + निहितः

(ङ) उपैति                  =      उप + एति

4. प्रकृति-प्रत्ययनिदर्शनं कुरुत –

(क) अपिहितम्           =    अप +धा (हि) + क्त

(ख) निहितः                =     नि + धा+क्तः

(ग) विमुक्तः               =      वि + मुच् + क्तः

(घ) विततः                 =      वि + तन् + क्तः

(ङ) विहाय                =      वि+हा + ल्यप्

5. समास-विग्रहं कुरुत

(क) अनृतम्             =      न नृतम् (नञ् तत्पुरुष)

(ख) आदित्यवर्णम्    =   I. आदित्यम् वर्णम् (कर्मधारय)

II. आदित्यः वर्णः इव

(ग) वीतशोकः          =      शोकम् रहितः (अव्ययीभाव)

(घ) देवयानः             =       देवस्य+यानः

(ङ) नान्यः                 =      न अन्यः (नञ् तत्पुरुष)

6. रिक्तस्थानानि पूरयत-

उत्तर- (क) हिरण्मयेन पात्रेण सैत्यस्यापिहितं मुखम्।

(ख) अणोरणीयान् महतो महीयान्।

(ग) सत्यमेव जयते नानृतम्।

(घ) यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे।

(ङ) तमेव विदित्नाति मृत्युमेति।

7. अधोनिर्दिष्टानां पदानां स्ववाक्येषु प्रयोगं कुरुत

उत्तर- (क) सत्यम्        =    सत्यम् वद।

(ख) सत्यस्य                 =    सत्यस्य परं निधानम्।

(ग) गच्छन्ति                 =     गच्छन्ति समुद्रे नद्यः।

(घ) विमुक्तः                =     विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः।

(ङ) अन्यः                   =     अन्यः अपि आगच्छति।

 


परीक्षा में पूछे जाने वाले अन्य महतवपूर्ण प्रश्न

जिसका उत्तर हिन्दी में लिखना होता है


1. ‘मङ्गलम्’ पाठ के आधार पर आत्मा की विशेषताएँ वतलाएँ।

उत्तर : ‘मङ्गलम्’ पाठ में संकलित कठोपनिषद् से लिए गए मंत्र में महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि प्राणियों की आत्मा हृदयरूपी गुफा में बंद है। यह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान-से-महान है। इस आत्मा को वश में नहीं किया जा सकता है। विद्वान लोग शोक-रहित होकर परमात्मा, अर्थात ईश्वर का दर्शन करते हैं।

2. ‘मङ्गलम्’ पाठ की विशेषताओं का वर्णन करें।

उत्तर : ‘मङ्गलम्’ पाठ में ईशावास्योपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद् तथा श्वेता श्वतरोपनिषद् के पाँच मंत्र हैं, जिसमें सत्य, आत्मा, ईश्वर-प्राप्ति हेतु प्रयास तथा आत्मनिश्छल भाव पर विशेष प्रकाश डाला गया है। इसमें ब्रह्मविषयक एवं आत्मविषयक ज्ञान की महत्ता बतलाई गई है। महर्षि वेदव्यास का कहना है कि सत्य ही मोक्ष का द्वार है। आत्मा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म तथा विशाल-से- विशाल है। इस रहस्य को वे ही समझ पाते हैं, जो अपने को अज्ञानी एवं ईश्वर का अंश मानते हैं।

3. विद्वान् पुरुष व्रह्म को किस प्रकार प्राप्त करता है?

उत्तर : मुण्डकोपनिषद् में महर्षि वेदव्यास का कहना है कि जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप, अर्थात् अपने व्यक्तित्व को त्याग कर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार महान पुरुष अपने नाम और रूप, अर्थात अहम को त्यागकर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

4. आत्मा का स्वरूप क्या है? पठित पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। [2020 (A) (S.S.)]

उत्तर : कठोपनिषद् में आत्मा के स्वरूप का बड़ी ही अपूर्व विश्लेषण किया गया है। आत्मा मनुष्य की हृदय रूप गुफा में अवस्थित है। यह अणु से भी सूक्ष्म है। यह महान् से भी महान् है। इसका रहस्य समझने वाला सत्य का अन्वेषण करता है। यह शोकरहित होता है।

5. उपनिषद् का क्या स्वरूप है? पठित पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर : उपनिषद् वैदिक बाङ्‌मय का अभिन्न अंग है। इसमें दर्शनशास्त्र सिद्धातों का प्रतिपादन किया गया है। सर्वत्र परमपुरुष परमात्मा का गुणगान किया गया है। परमात्मा के द्वारा ही यह संसार व्याप और अनुशंसित है। सत्य की पराकाष्ठा ही ईश्वर का मूर्तरूप है। ईश्वर ही सभी तपस्याओं का परम लक्ष्य है।

6. धर्मवान की प्राप्त के लिए कैसी कामना की गई है?

उत्तर : सांसारिक जीवन ईर्ष्या, मद, मत्सर, परिग्रह आदि से परिपूर्ण है। सुख की प्राप्ति में मनुष्य सत्कर्म को छोड़कर अन्य कार्मों में संलग्न है। सांसारिक जीवन मिथ्या है। यह जानते हुए भी मनुष्य असद्गति में ही सन्निहित है। ईशावस्य में कहा गया है कि सत्य के द्वार पर सोने की तरह ज्योतिर्मय पात्र से ढँके हुए मुख में सत्य की ओर ही अभिप्रेत करें।

7. उपनिषद् ग्रंथ का मूल उद्देश्य क्या है?

उत्तर : उपनिषद् वैदिक वाङ्मय का अंतिम भाग है। इसमें दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों का वर्णन है। इस ग्रंथ का मूल उद्देश्य परमपुरुष परमात्मा की महिमा का वर्णन करना है। आत्मविषयक और ब्रह्मविषयक तत्त्वों की विस्तृत व्याख्या करना. भी उपनिषद् का उद्देश्य है।

8. उपनिषद् को आध्यात्मिक ग्रंथ क्यों कहा गया है?

उत्तर : उपनिषद् एक आध्यात्मिक ग्रंथ है, क्योंकि यह आत्मा और परमात्मा के संबंध के बारे में विस्तृत व्याख्या करता है। परमात्मा संपूर्ण संसार में शांति स्थापित करते हैं। सभी तपस्वियों का परम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करना ही है।

9. महान लोग संसाररूपी सागर को कैसे पार करते हैं?

उत्तर : श्वेताश्वतर उपनिषद् में ज्ञानी लोग और अज्ञानी लोग में अंतर स्पष्ट करते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि अज्ञानी लोग अंधकारस्वरूप और ज्ञानी प्रकाशस्वरूप हैं। महान लोग इसे समझकर मृत्यु को पार कर जाते हैं। संसाररूपी सागर को पार करने का इससे बढ़कर अन्य कोई रास्ता नहीं है।

10. ईश्वर-प्राप्ति ही तपस्या का मूल उद्देश्य क्यों है?

उत्तर : सभी तपस्वियों के तपस्या का मूल उद्देश्य ईश्वर-प्राप्ति ही है, क्योंकि इसी से संसार में आवागमन के बन्धन से मुक्ति मिलती है। आत्मा के विषय में भी जानकारी मिलती है। सत्य के कारण ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

11. ‘मंगलम्’ पाठ के आधार पर सत्य का स्वरूप वताएँ। [2019 (A) (F.S.)]

उत्तर : मंगलम् पाठ में सत्य के विषय में कहा गया है कि सत्य का मुख सोने के आवरण से ढँका हुआ है। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि हे प्रभु उस माया रूपी स्वर्ण को हटा दीजिए जिससे सत्य का ज्ञान हो सके अर्थात् परमपिता परमेश्वर से साक्षात्कार हो सके।

 

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